Tuesday, 11 February 2020

पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र

पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र :-  पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र सूर्य की सिंह राशि मे 13°20' से आगे 26°40' तक होता हैं।यह क्रांतिवृत से 14 अंश 20 कला उत्तर तथा विषुवत रेखा से 20 अंश 32 कला 25 विकला उत्तर में है। सिंह राशि भचक्र की पांचवी राशि है।जिसके स्वामी स्वयं सूर्य देव हैं। इसका मुख्य तारा मघा से उत्तर पूर्व की ओर है। अगस्त के महीने के अन्त में सूर्य पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में गोचर करते है। यह नक्षत्र हमेशा पूर्व दिशा में उदित होते हैं। पुर्वा का अर्थ है पहले और फाल्गुनी का अर्थ है लाल रंग हैं।यह साहस ,उत्साह,ऊर्जा,बल,पराक्रम की संज्ञा के रूप से जाना जाता हैं।इस नक्षत्र को चारपाई के अगले पावँ के रूप में जाना जाता है।विश्राम का स्थल हैं।भग को पुर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का अधिष्ठित देवता माना जाता है ,इसकी उपमा भोर के तारे के रूप दी है। सुबह उदित तारा हैं।भग देवता को सुख,वैभव एवं आनन्द के स्वरूप में जाना जाता है। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक देह सुख की चिन्ता अधिक करते है। अपनी सुंदरता को बनाए रखने के लिए सौंदर्य प्रसाधनों का सहारा लिया करते है। इन जातकों शिव की उपासना करनी चाहिए। ये जातक बाहरी दुनिया से दूरी बनाए रखने में भी सक्षम होते हैं और दूसरे शब्दों में आत्म केंद्रित होते हैं और दूसरे उनको सनकी भी समझने लगते है। बाहरी दुनियाँ के लोगों से मेलजोल बढ़ाना चाहते हैं। इसके साथ सामाजिक परम्परा का ध्यान में रख कर चलते हैं। इनके व्यवहार में अधिक लचीलापन पाया जाता हैं। सिंह राशि अग्नितत्त्व की राशि मे स्थित पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र वाले क्रूर,हिंसक और अधोमुखी भी बनते है।

                                               





 अभिमान,द्वेष व प्रतिशोध की भावना होने पर भी ऐसा जातक दूसरे के सुख और दुख में सहयोग करते है।हमारे वेद शास्त्र पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र को क्रूर नक्षत्र की संज्ञा दी है फिर भी यह एक संतुलित नक्षत्र हैं। लोगो को देखने मे यह मनुष्य सुस्त दिखाई देते हो फिर भी यह अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने में सक्षम होते हैं। हर छोटी और बड़ी बात को ध्यान में रखते है।देवताओं के गुरु शुक्राचार्य जी इस नक्षत्र को ब्राह्मण मानते हैंऔर यह सतोगुणी नक्षत्र मानते हैं। ब्राह्मण को सत्य,ब्रह्म को जानने वाले ,अपने आश्रित को शरण देने वाले होते हैं। इन जातकों विशेष गुण होता हैं मन्त्र विद्या के ज्ञान से लोगों के दुःख दूर करने में सक्षम होते है। इस नक्षत्र को स्त्री जाति की संज्ञा दी है। पर्वाफाल्गुनी नक्षत्र अग्नि तत्व, पित प्रधान नक्षत्र भी कहते है। दक्षिण-पूर्व दिशा निर्देशन करते है। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के चार चरण हैं। प्रथम चरण :- सिंह राशि मे 13°20' से 16°40' तक सूर्य के सिंह  नवांश में पड़ता हैं।इस चरण में जन्म लेने वाले जातक सुख,मान,प्रतिष्ठा एवं यश पाता हैं।अविकसित जीवात्मा, अंहकारी, और मिथ्याभिमानी होने और से अपने आप अच्छा समझता है। सूर्य,मंगल,गुरु तथा केतु इस नक्षत्र वाले जातकों धन,वैभव और सत्ता का सुख प्राप्त करते है।

द्वितीय चरण :- पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का द्वितीय पद सिंह राशि के 16°40' से 20° तक बुध के कन्या नवांश में होता हैं। इस पद में जन्म लेने वाले जातक शिष्ट,सदाचारी,परिश्रमी एवं व्यापार में कुशल होता हैं। व्यापार में उनकी विशेष रुचि होती है। ये जातक व्यापार से धन अर्जित करते है।

पूर्वाफाल्गुनी तीसरा चरण :- यह पद सिंह राशि के शुक्र के तुला नवांश में होता हैं। इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले जातक यात्रा,शिष्ट, सौंदर्य प्रेम,नेक सलाह देने केलिए प्रसिद्ध होते है।सभी शुभ गुणों से शुभ फल प्राप्त करते हैं। शुक्र ग्रह इनको  सभी प्रकार के साधन सम्पन्न बनता हैं।

पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र का चौथा पद :- यह पद सिंह में मंगल के वृश्चिक नवांश में पड़ता हैं। इस पद में जन्म लेने वाले जातक भावुक,अपने परिवार को अधिक महत्व देने वाले शक्तिशाली होते हैं। कभी कभी क्रोधी,उग्र स्वभाव वाले होते हैं।जिसकी वजह से व्यर्थ में परेशानी मोल ले लेते है। सूर्य एवं गुरु की कृपा सैदव बनी रहती है।

व्यवसाय :-  उच्च अधिकारी, सरकारी सेवा, राजदूत,सौन्दर्य प्रसाधनों के निर्माता,कलाकार,अभिनय,संगीतज्ञ,  मॉडल, विवाह उत्सव से सम्बंधित कार्यो, उपहार सामग्री, फोटोग्राफर, प्रसूति केन्द्र चला लेने वाले ,डॉक्टर,चिकित्सक, नर्स,यौवन रोग विशेषज्ञ, प्राणी विज्ञान, इत्र एवं सुगंधित वस्तुओं के निर्माता,रेशमी,ऊनी,सूती वस्त्रों का क्रय और विक्रेता,  सचिव आदि के कार्य करते हैं।
मूषक योनि, अत्रि ऋषि के वंशज, शुक्र ग्रह नक्षत्र के स्वामी और राशिपति सूर्य हैं।

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